परमार्थ निकेतन से गौ संरक्षण का आह्वान धूमधाम से गोपाष्टमी पर्व मनाया



मुनि की रेती (आशीष कुकरेती) गोपाष्टमी के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में भारत सहित विश्व से आये श्रद्धालुओं ने गौ पूजन कर गौपाष्टमी का पर्व मनाया। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन में विशेष यज्ञ व विशाल भंडारा का आयोजन किया। इस अवसर पर फ्रांस, जर्मनी, इटली, इंग्लैंड, स्पेन, इथुआनिया, लातविया, कनाडा और अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों से आये पर्यटकों ने सहभाग किया।
यह पवित्र पर्व गौमाता के स्वरूप, महत्व और उनके संरक्षण के संकल्प का त्योहार है। सनातन संस्कृति में गौ को केवल पालन करने वाला पशु नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और धर्म का आधार माना गया है। गोपाष्टमी हमें स्मरण कराती है कि गौमाता हमारी श्रद्धा, संवेदना और सनातन चेतना की जीवंत ध्वजा हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत वह भूमि है जहाँ गौ को “माता” कहा गया, जहाँ वेदों और शास्त्रों ने उन्हें “कामधेनु” सर्वसमृद्धि की अधिष्ठात्री का दर्जा दिया है। गौमाता का सम्मान हमारे सभ्य समाज की पहचान है। परंतु यह दुःखद है कि आज, आधुनिकता और भौतिकता की चकाचैंध में वही गौमाता सड़कों पर घायल और उपेक्षित अवस्था में दिखाई देती हैं। यह स्थिति हमारी सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली है।
गौमाता का महत्व केवल अध्यात्म तक सीमित नहीं है। वे पोषण, कृषि, पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य इन सभी क्षेत्रों का स्थायी आधार हैं। उनके पंचामृत तत्व, दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर न केवल आयुर्वेद और उपचार विज्ञान का मूल हैं, बल्कि जैविक कृषि और सतत विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसी कारण शास्त्रों में कहा गया “गावो विश्वस्य मातरः” अर्थात् गौ सम्पूर्ण विश्व की माता हैं।
स्वामी जी ने कहा कि कगौमाता धरती की धड़कन हैं। उनके साथ हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि-आधारित जीवनशैली और पर्यावरण संतुलन सीधा जुड़ा हुआ है। गोबर और गोमूत्र जैविक खाद व कीट प्रबंधन में वरदान के समान हैं, जो भूमि की उर्वरता को बढ़ाते हुए जल, वायु और मिट्टी के प्रदूषण को रोकते हैं। जहाँ गौ का संरक्षण सुदृढ़ है, वहाँ न सिर्फ पशु-धन सुरक्षित रहता है बल्कि गाँव, किसान और जल, जंगल, जमीन का ताना-बाना भी मजबूत होता है।
गोपाष्टमी का यह महापर्व हमें याद दिलाता है कि गौ केवल धर्म नहीं, धरती का विज्ञान है, गौ केवल पूजन नहीं, पोषण है, गौ केवल परंपरा नहीं, प्रकृति का संरक्षण है।
स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने कहा कि गौमाता जीवनदायिनी हैं। जहाँ गौ का सम्मान है, वहाँ समृद्धि है, स्वास्थ्य है, धर्म है और दया का सतत प्रवाह है। गौ संरक्षण केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता का उत्तरदायित्व है।
स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गौमाता को देवीस्वरूप इसलिए स्वीकारा गया है क्योंकि वे हमें केवल दूध ही नहीं देतीं बल्कि संपूर्ण जीवन को संतुलित करने की शक्ति प्रदान करती हैं। उनके शरीर में 33 कोटि देवताओं का वास बताया गया है यह उनकी आध्यात्मिक महिमा का संकेत मात्र नहीं, बल्कि उनकी उपयोगिता और जीवन-निर्माण से जुड़ी वैज्ञानिक सच्चाई का भी प्रतीक है।
आज आवश्यकता है कि समाज फिर से उस भाव को जिये जिसमें गौमाता को परिवार और संस्कृति का केंद्र माना जाता था। गौशालाओं को मजबूत करना, निराश्रित गौधन की देखभाल, गो-आधारित कृषि और आयुर्वेदिक उत्पादों को बढ़ावा देना, तथा गोसंरक्षण को जनआंदोलन बनाना यही समय की मांग है।
इस अवसर पर श्रीमती अलका थमेचा जी, प्रदीप थमेचा जी, स्माल्को क्सेनिया, सोकोलोवा एकातेरिना, पोपोविच तात्याना, इवानियुक मार्गारिटा, कुर्जेनकोवा एकातेरिना, पैंतेलीवा ओल्गा, पोपोव तात्याना, कामारोउस्काया एलेना, ग्लेडिशेवा इरीना, नागोवित्स्यना इरीना और तात्याना मराहोव्स्काया आदि ने सहभाग किया।


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