पौष पूर्णिमा, सनातन चेतना का पावन द्वार, माघ मेला, प्रयागराज 2026 का शुभारम्भ



 

ऋषिकेश (आशीष कुकरेती ) 3 जनवरी। पौष पूर्णिमा सनातन परंपरा में एक ऐसी तिथि जो आत्मशुद्धि, साधना और संतुलित जीवन का पावन द्वार है। यह वह पवित्र अवसर है जब हम अपने भीतर झांककर भोग से योग और अहंकार से आत्मबोध की यात्रा का संकल्प लेते हैं। इसी दिव्य परंपरा के अंतर्गत 3 जनवरी 2026 से त्रिवेणी संगम, प्रयागराज में माघ मेला एवं कल्पवास का शुभारम्भ हो रहा है, जो भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय चेतना का विराट उत्सव है।
माघ मेला स्वयं के पुनर्जागरण का महासंकल्प है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर होने वाला यह आयोजन जीवन को दिशा देने वाला आध्यात्मिक प्रयोग है। संगम-स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि मन, विचार और संस्कारों की निर्मलता का प्रतीक है। यह स्नान हमें स्मरण कराता है कि जैसे जल, मल को धो देता है, वैसे ही श्रद्धा और संकल्प जीवन के विकारों को धो सकते हैं।
कल्पवास, जो पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक चलता है, सनातन जीवन-दर्शन का जीवंत स्वरूप है। यह एक ऐसा व्रत है जिसमें व्यक्ति सीमित साधनों में रहकर, सादगी, संयम, मौन, सेवा और सत्संग के माध्यम से अपने भीतर की चेतना को जाग्रत करता है। आज के भौतिकतावादी और तीव्र गति वाले युग में, जहाँ सुविधाएँ बढ़ी हैं पर शांति घटती जा रही है, कल्पवास एक सशक्त उत्तर बनकर उभरता है। यह जीवन को विलास से विरक्ति की ओर नहीं, बल्कि संतुलन की ओर ले जाता है, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा वैभव बन जाती है।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने कहा कि माघ मेले का संदेश अत्यंत समसामयिक है। आज जब विश्व पर्यावरण संकट, जल संकट और मानसिक तनाव से जूझ रहा है, तब संगम-स्नान हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है। यह पर्व जल-संवर्धन, नदी संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन का मौन आह्वान है।
स्वामी ने कहा कि मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी चेतना हैं, जो हमें पवित्रता, प्रवाह और करुणा का संदेश देती हैं।
माघ मेला भारत की सांस्कृतिक एकता का विराट मंच है। यहाँ जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्रीय भेद मिट जाते हैं। संत और सामान्य जन, युवा और वृद्ध, गृहस्थ और संन्यासी, सभी एक ही ध्येय से बंधे होते हैं, आत्मोन्नति और लोकमंगल। यही वसुधैव कुटुम्बकम् की जीवंत अनुभूति है, जहाँ पूरा विश्व एक परिवार के रूप में अनुभव किया जाता है।

स्वामी  ने कहा कि माघ मेला, जीवन-शैली का उत्सव है। ब्रह्ममुहूर्त में स्नान, हरि-नाम का स्मरण, संत-सत्संग, सेवा और स्वाध्याय, ये कर्म नहीं, बल्कि संस्कारों की पुनर्स्थापना हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि वास्तविक प्रगति केवल तकनीकी उन्नति में नहीं, बल्कि चेतना की ऊँचाई में निहित है।

स्वामी  ने कहा कि वर्ष 2026 का माघ मेला विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब मानवता दिशा की तलाश में है। तकनीक ने गति दी है, पर दिशा नहीं। ऐसे में सनातन परंपरा का यह महाकुंभ जीवन को सही दिशा देने वाला प्रकाशस्तंभ बनकर सामने आया है।

पौष पूर्णिमा और माघ मेला हमें आमंत्रित करते हैं, आइए, जीवन को फिर से पवित्र करें। आइए, अहंकार की कठोरता को त्यागकर करुणा, संयम और संतुलन को अपनाएँ। आइए, संगम की दिव्य धारा में स्नान कर केवल शरीर ही नहीं, अपने विचार और कर्म भी शुद्ध करें।

माघ का यह पावन अवसर भारत की आत्मा का उत्सव है, जहाँ परंपरा और प्रगति, साधना और सेवा, व्यक्ति और समाज एक-दूसरे से जुड़कर एक समग्र जीवन-दर्शन का निर्माण करते हैं। यही माघ मेला का शाश्वत संदेश है और यही पौष पूर्णिमा की सनातन पुकार, भोग से योग, अहंकार से आत्मबोध और व्यक्ति से विश्व-कल्याण की ओर।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारे चैनल में आपका स्वागत है, खबरों व विज्ञापन के लिए संपर्क करें -+91 8859895608
error: Content is protected !!