कथावाचक देवी चित्रलेखा ने सपरिवार परमार्थ निकेतन पहुंच कर गंगा आरती में सहभाग किया



ऋषिकेश (आशीष कुकरेती) 10 दिसम्बर। परमार्थ निकेतन में प्रसिद्ध कथावाचक देवी चित्रलेखा  अपने परिवार के साथ दर्शनार्थ आयी, उन्होंने स्वामी चिदानंद सरस्वती  महाराज और साध्वी भगवती सरस्वती  के पावन सान्निध्य में आयोजित दिव्य गंगा आरती में सहभाग किया।
गंगा तट पर सायंकालीन वातावरण अत्यंत दिव्य और भावपूर्ण था। मां गंगा की शीतल लहरों के बीच मंत्रों की पवित्र ध्वनि, दीपों की सुनहरी रोशनी और विश्व-मंगल की सामूहिक प्रार्थना ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया। देवी चित्रलेखा  ने अपने परिवार के साथ आरती में सहभाग कर अपनी मंत्रमुग्ध करने वाली वाणी में नाम संर्कीतन किया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने कहा कि आज मानव अधिकार दिवस के अवसर पर समूची मानवता को यह स्मरण कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि सनातन भारत की शाश्वत धरोहर हैं। पश्चिम में मानवाधिकारों का विचार युद्धों और संघर्षों के बाद दस्तावेजों में लिखा गया, पर भारत ने इन आदर्शों को हजारों वर्षों से अपने जीवन, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा में आत्मसात किया है। उपनिषद, गीता और वेद से लेकर महाभारत व रामायण हर शास्त्र “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के व्यापक, सर्वसमावेशी और सार्वभौमिक संदेश को प्रकट करते हैं। यह केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि समूचे मानव समाज, प्रकृति, सभी प्राणियों एवं संपूर्ण सृष्टि के सुख, स्वास्थ्य और सुरक्षा का सनातन अधिकार है।
आज जब दुनिया आधुनिक मानवाधिकारों की बात करती है, तब भारतीय चिंतन कर्तव्य को सर्वोपरि रखता है। हमारे ऋषियों ने सिखाया कि जब कर्तव्य का पालन होता है, तब अधिकार स्वाभाविक रूप से सुरक्षित रहते हैं। मनुष्य और प्रकृति दोनों का संरक्षण भारतीय सभ्यता के मूल में है। अथर्ववेद में वर्णित पंक्ति “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” न केवल पर्यावरणीय अधिकारों की प्राचीन घोषणा है, साथ ही धरती के प्रति हमारी आध्यात्मिक जिम्मेदारी का स्मरण भी है।
स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि आज जब दुनिया एआई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर तेजी से बढ़ रही है, तब उतनी ही आवश्यकता है एसआई, सनातन इंटेलिजेंस और आरई, ऋषि इंटेलिजेंस की है। हमारे ऋषियों का चिंतन, उनका विज्ञान, उनका आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सबके कल्याण के सार्वभौमिक मंत्र वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि दुनिया इन सनातन सिद्धांतों दया, करुणा, न्याय, समानता, प्रकृति संरक्षण और सामूहिक कल्याण का अनुसरण करे, तो मानवाधिकार केवल घोषणाओं में नहीं, बल्कि जीवन में उतर आएंगे।
साध्वी भगवती सरस्वती  ने कहा कि भक्ति की शक्ति सचमुच अद्भुत और अनंत है। जब हृदय भक्ति से भर जाता है, तब भय, क्रोध, दुख और भ्रम सभी स्वतः दूर हो जाते हैं। भक्ति हमें ईश्वर से जोड़ती है, पर साथ ही हमारे भीतर छिपी करुणा, धैर्य, शांति और प्रेम को भी जागृत करती है। भक्ति केवल पूजा या अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि एक समर्पण है, अपनी अहंकार की दीवारों को गिराकर स्वयं को दिव्य इच्छा के प्रेमपूर्ण प्रवाह में प्रवाहित कर देना ही भक्ति है जो हमें भीतर से रूपांतरित कर जीवन को पवित्र बना देती है।
देवी चित्रलेखा  ने कहा कि परमार्थ गंगा तट से “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का भाव केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता दर्शन कर सकती है। परमार्थ निकेतन मेरा ही परिवार है, यहां आकर ऐसे लगाता है मानों मैं अपने घर लौट आयी हूं। उन्होंने कहा कि मां गंगा केवल एक नदी नहीं हैं, वे स्वयं दिव्यता की सजीव अनुभूति हैं। महादेव की करुणा गंगा रूप में धरा पर उतरकर हमें पवित्र करती है। भगवान श्री कृष्ण का प्रेम गंगा की धारा बनकर संसार को अनवरत शीतलता और मधुरता देता है। भगवान श्री राम की मर्यादा इसी जल में प्रवाहित होकर हमें धर्म, संयम और कर्तव्य का संदेश देती है। यह केवल पानी नहीं, यह हमारे अस्तित्व, हमारी चेतना और हमारी संस्कृति का शाश्वत आधार है।
स्वामी और साध्वी  ने देवी चित्रलेखा और पूरे परिवार को रूद्राक्ष का दिव्य भेंट कर उनका अभिनन्दन किया।


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