

ऋषिकेेश (आशीष कुकरेती ) 5 नवम्बर परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में आज श्रद्धा और भक्ति के पावन वातावरण में श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। इस दिव्य कथा का उद्घाटन पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में हुआ। कथा व्यास श्री मूर्तिमान प्रभु जी के श्रीमुख से श्रीमद् भागवत महापुराण की ज्ञान गंगा प्रवाहित हो रही है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि ऋषि-मुनियों की पावन भूमि भारत में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन मूल्य और आध्यात्मिक संदेश लेकर आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा, देव दिवाली और श्री गुरु नानक देव जी का पावन प्रकाश पर्व मानवता को प्रकाश से जोड़ने का संदेश देता हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि देव दिवाली, बाहरी दीपों से आगे, भीतरी दिव्यता का प्रकाश है। कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को भगवान शिव ने त्रिपुरासुर पर विजय प्राप्त की और देवताओं ने गंगा तट पर दीप प्रज्ज्वलित कर उस विजय का उत्सव मनाया। यही क्षण “देव दिवाली” का प्रारंभ हुआ। काशी की धरती इस दिन केवल दीपकों से नहीं, बल्कि साधना, सेवा और संकल्प की दिव्यता से प्रकाशमान होती है।
देव दिवाली हमें यह प्रेरणा देती है कि हम अपने अंदर विद्यमान लोभ, क्रोध, घृणा व अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर करुणा, पवित्रता और सेवा का दीप प्रज्ज्वलित करें। प्रभु का प्रकाश तभी बाहर जगमगाता है जब वह भीतर प्रज्वलित होता है।
स्वामी जी ने कहा कि श्री गुरु नानक देव जी एकत्व, सत्य और सेवा के प्रकाश स्तंभ हैं। उनका संदेश सम्पूर्ण मानवता के लिए सार्वकालिक और सार्वभौमिक है।
उन्होंने बताया कि सबमें वही एक परम सत्ता है, इसलिए भेदभाव, ऊँच-नीच, जाति-धर्म के आधार पर किसी को कमतर समझना अज्ञानता है। गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ तीन मूल स्तम्भों पर आधारित हैं, किरत करो ईमानदार परिश्रम से आजीविका चलाना। नाम जपो, प्रभु के नाम का ध्यान कर मन को निर्मल रखना और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाना। वंड छको, अपनी अर्जित पूँजी और संसाधन समाज के साथ बाँटना, क्योंकि हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सामाजिक न्याय, समानता और मानव एकता उनके संदेश के मूल में है
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि जब हम स्वयं दीप बन जाते हैं, तब हमारा जीवन ही पूजा बन जाता है। ईश्वर बाहर नहीं हमारे हृदय में है। उसी ज्योति को फैलाना ही जीवन का उद्देश्य है। प्रकाश का अर्थ केवल दीपक जलाना नहीं, दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाना है।
गंगा जी की पावन धारा की तरह आप सभी के जीवन में श्रीमद् भावगत कथा के माध्यम से पवित्रता, शांति और सेवा भी प्रवाहित होती रहे।

