ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट के सफलतापूर्वक लॉन्च पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष चिदानन्द सरस्वती ने इसरो एवं भारतीय वैज्ञानिकों को दी शुभकामनाएँ



 

ऋषिकेश आशीष कुकरेती 24 दिसम्बर भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा एलव्हीएम3-एम6 प्रक्षेपण की सफल उड़ान, जिसके माध्यम से भारत की धरती से अब तक का सबसे भारी उपग्रह, अमेरिका का ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट अपने निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया, यह न केवल तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि भारत की वैज्ञानिक चेतना, संकल्प और सामर्थ्य का विश्व के समक्ष सशक्त उद्घोष है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर  स्वामी चिदानन्द सरस्वती  अध्यक्ष, परमार्थ निकेतन, ने इसरो के समस्त वैज्ञानिकों, अभियंताओं और तकनीकी टीम को अनेकानेक शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक गौरवपूर्ण मील का पत्थर है, जो यह दर्शाती है कि जब विज्ञान, संकल्प और राष्ट्रभाव एक साथ चलते हैं, तो असंभव भी संभव बन जाता है।
स्वामी ने कहा कि एलव्हीएम3-एम6 की यह सफलता भारत की हेवी-लिफ्ट लॉन्च क्षमता को नई ऊँचाइयों तक ले जाती है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत को वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण बाजार में एक विश्वसनीय, सशक्त और अग्रणी भागीदार के रूप में स्थापित करती है। आज विश्व भारत की ओर आशा, भरोसे और सम्मान की दृष्टि से देख रहा है, यह हमारे वैज्ञानिकों की वर्षों की तपस्या, अनुशासन और अथक परिश्रम का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत के संकल्प की भी सशक्त अभिव्यक्ति है। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक स्वावलंबन नहीं, बल्कि बौद्धिक, वैज्ञानिक और नैतिक आत्मबल से युक्त राष्ट्र का निर्माण है। इसरो के वैज्ञानिकों और अभियंताओं ने सीमित संसाधनों में असीम संभावनाओं को साकार कर यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय प्रतिभा किसी से कम नहीं है। यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि वे विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सहभागी बनें।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने कहा कि भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा सदैव आकाश, ब्रह्मांड और सृष्टि के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा से प्रेरित रही है। आज वही जिज्ञासा आधुनिक विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान के रूप में साकार हो रही है। हमारे वैज्ञानिक प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक के सेतु बनकर भारत को नई दिशा दे रहे हैं। यह उपलब्धि बताती है कि भारत केवल अतीत की महान सभ्यता नहीं, बल्कि भविष्य का नेतृत्व करने वाला राष्ट्र है।
उन्होंने इस अवसर पर यह भी कहा कि अंतरिक्ष अनुसंधान केवल उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मानव जीवन की गुणवत्ता से है चाहे वह संचार हो, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, कृषि, शिक्षा या पर्यावरण संरक्षण। इसरो के प्रयासों से अंतरिक्ष विज्ञान जन-कल्याण का माध्यम बन रहा है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को वैश्विक स्तर पर साकार करता है।
स्वामी ने इसरो के वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा, “आप सभी राष्ट्र के अद्भुत साधक हैं। आपकी प्रयोगशालाएँ आपके आश्रम हैं, आपके रॉकेट आपकी साधना का परिणाम हैं, और आपकी सफलता भारत की आत्मा का उत्सव है।” उन्होंने देश के युवाओं से आह्वान किया कि वे इन वैज्ञानिकों को अपना आदर्श मानें और विज्ञान को सेवा, नैतिकता और राष्ट्रहित से जोड़कर आगे बढ़ें।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने पुनः इसरो परिवार, भारत सरकार और इस मिशन से जुड़े प्रत्येक कर्मयोगी को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि भारत अंतरिक्ष की दुनिया में निरंतर नई ऊँचाइयों को छू रहा है। यह उड़ान केवल रॉकेट की नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की उड़ान है।


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