


ऋषिकेश (आशीष कुकरेती) 25 अगस्त ऋषिकेश भारतीय सनातन परंपरा में सेवा को साधना, करुणा और आत्मशुद्धि का मार्ग है। जब किसी भूखे के हाथ में अन्न पहुँचता है, किसी संत को सम्मानपूर्वक भोजन मिलता है और किसी निराश्रित के जीवन में अपनत्व का भाव जागता है, तब सेवा केवल शरीर का पोषण नहीं करती, बल्कि समाज में संवेदना और मानवता का पोषण करती है। इसी सनातन भाव को साकार करता है परमार्थ निकेतन का 365 दिन चलने वाला भंडारा, जहाँ साधु-संतों, तपस्वियों, जरूरतमंदों और निराश्रितजनों के लिए नियमित रूप से भोजन सेवा की जाती है।
भंडारा सेवा अन्न वितरण के साथ ही ‘अन्न ही जीवन है और अन्नदान महादान है’ की भारतीय परंपरा का जीवंत स्वरूप है। विशेष रूप से मानसून के दौरान जब वर्षा और अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ जरूरतमंदों के लिए जीवन को और चुनौतीपूर्ण बना देती हैं, तब यह अन्नसेवा अनेकों के लिए सहारा बनती है।
परमार्थ पीठाधीश्वर, स्वामी चिदानन्द सरस्वती के अवतरण दिवस 3 जून से इस विशेष भंडारा सेवा को और व्यापक रूप में गति मिली। उनके जीवन का मूल संदेश ही सेवा, साधना और संस्कारों के समन्वय का संदेश है। उनके लिए आध्यात्मिकता केवल ध्यान और पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि वह जीवन में करुणा, सेवा, पर्यावरण संरक्षण और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता के रूप में प्रकट होनी चाहिए।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती के अवतरण दिवस से प्रारंभ हुई यह भंडारा सेवा उनके जीवन-संदेश को भी अभिव्यक्त करती है साधना से संवेदना, संवेदना से सेवा और सेवा से समाज में सद्भाव।
365 दिन चलने वाली यह अन्नसेवा वस्तुतः सनातन संस्कृति के “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के संकल्प को धरातल पर उतारने वाली एक सतत साधना है, एक ऐसी साधना, जिसमें मंत्र भी है, सेवा भी; भक्ति भी है, करुणा भी; अन्न भी है और आत्मीयता भी।

