

ऋषिकेश (आशीष कुकरेती) वृंदावन, 28 फरवरी परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष, स्वामी शुकदेवानन्द ट्रष्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी, स्वामी चिदानन्द सरस्वती का ब्रह्मलीन विरक्त शिरोमणि स्वामी वामदेव महाराज के शताब्दी आनंद महोत्सव में पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर अनेक पूज्य संत, श्रीमहंत, आचार्य और अनेक विशिष्ट विभूतियों की गरिममायी उपस्थिति रहीं।
पूज्य ब्रह्मलीन विरक्त शिरोमणि संत स्वामी वामदेव महाराज के 100वां जयंती वर्ष श्रद्धा, सेवा और संस्कार का उत्सव मनाया गया। सभी विभूतियों ने वेदमंत्रों के साथ अपनी भावाजंलि अर्पित की।
इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत की संत परंपरा केवल आध्यात्मिक साधना का मार्ग नहीं दिखाती, बल्कि समाज, संस्कृति और मानवता को दिशा देने वाली जीवंत चेतना है। इसी गौरवशाली परंपरा के दिव्य स्तंभ, ब्रह्मलीन विरक्त शिरोमणि स्वामी वामदेव महाराज के पावन शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में “शताब्दी आनंद महोत्सव” का आयोजन उनके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और संकल्पों का जीवंत प्रतीक हंै। यह महोत्सव केवल एक जन्मशती समारोह नहीं, बल्कि संत जीवन के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अभियान है।
स्वामी वामदेव महाराज का सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और राष्ट्रधर्म की भावना से ओतप्रोत रहा। उन्होंने अपना प्रत्येक श्वास ईश्वर साधना, वेद-पुराणों के प्रचार, गौसेवा, गंगा संरक्षण, संस्कार निर्माण और जनकल्याण के लिए समर्पित किया। उनका व्यक्तित्व सादगी, करुणा और आत्मीयता का अद्भुत संगम था। वे समाज के पथप्रदर्शक, संस्कृति के संवाहक और हम सभी के प्रेरणास्रोत थे।
ऐसे महापुरुष के शताब्दी महोत्सव को करुणा और सेवा भावना का मूर्त रूप देने के लिए विभिन्न सेवा कार्यक्रम भी आयोजित किये गये, यथा निःशुल्क चिकित्सा शिविर, अन्नदान, वस्त्र वितरण, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, गौसेवा तथा निर्धन छात्रों के लिए शैक्षणिक सहायता।
स्वामी का जीवन भारतीय संस्कृति की उस धारा का प्रतीक था, जिसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना जीवंत रहती है। उन्होंने जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर मानवता को ही धर्म माना। उनका आश्रम सदैव सबके लिए खुला रहा, जहाँ से हर जिज्ञासु को मार्गदर्शन मिला। शताब्दी महोत्सव इसी समावेशी दृष्टि को पुनर्जीवित करने का प्रयास है।
आज जब आधुनिकता की दौड़ में समाज अपने मूल्यों से दूर होता जा रहा है, ऐसे समय में संतों का जीवन प्रकाशस्तंभ की तरह हमारा मार्ग आलोकित करता है। स्वामी वामदेव जी ने सिखाया कि आध्यात्म केवल मठों तक सीमित नहीं, बल्कि कर्म, सेवा और राष्ट्रनिर्माण में प्रकट होना चाहिए। उनके विचार युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने, भारतीयता पर गर्व करने और नैतिक जीवन अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
शताब्दी आनंद महोत्सव” के माध्यम से नई पीढ़ी को संत परंपरा से जोड़ना, संस्कृति के संरक्षण का संकल्प लेना और समाज में सकारात्मक चेतना जगाना हमारा प्रमुख लक्ष्य हो। आइए, हम सब मिलकर इस शताब्दी वर्ष को केवल स्मरण का नहीं, बल्कि संकल्प, सेवा और संस्कार का वर्ष बनाएं। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन महान संत को, जिन्होंने अपना जीवन मानवता के कल्याण हेतु समर्पित कर दिया।

