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रशियन प्रतिनिधिमंडल पहुंचा परमार्थ निकेतन चिदानन्द सरस्वती और रशियन दल के प्रमुख मिखाइल अस्लोव की हुई भेंटवार्ता



ऋषिकेश आशीष कुकरेती 15 दिसम्बर भारत की लगभग 15 दिनों की विविधतापूर्ण यात्रा के उपरांत रशियन प्रतिनिधिमंडल ने अपनी यात्रा का भावपूर्ण विराम हिमालय की गोद में, माँ गंगा के पावन तट पर स्थित विश्वविख्यात परमार्थ निकेतन आश्रम में किया। यह यात्रा-विराम केवल एक ठहराव नहीं, बल्कि आत्मिक शांति, सांस्कृतिक संवाद और आध्यात्मिक अनुभूति का सजीव अनुभव बन गया।हिमालय की शांत वादियों में स्थित परमार्थ निकेतन आश्रम स्वयं में साधना, सेवा, करुणा और शांति का जीवंत प्रतीक है। जैसे ही रशियन प्रतिनिधिमंडल आश्रम परिसर में प्रविष्ट हुआ, परमार्थ निकेतन के वातावरण की दिव्यता, गंगाजी की निर्मल धारा और हिमालय के मौन सान्निध्य ने सभी को गहराई से आत्मिक रूप से स्पर्श किया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने कहा कि भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आधुनिक स्थलों का भ्रमण किया, किंतु परमार्थ निकेतन में उन्हें जो आंतरिक शांति और दिव्यता का अनुभव हुआ, यह वास्तव में अद्वितीय है।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज के सान्निध्य में पहुँचते ही प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने सहज ही शांति और संतोष का अनुभव किया। स्वामी  के स्नेहिल व्यवहार, सरल व्यक्तित्व और गहन विचारों ने सभी को गहराई से प्रभावित किया। अपने संवाद में स्वामी जी ने जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने, सेवा भाव को दैनिक जीवन में अपनाने और आध्यात्म को केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारने का संदेश दिया.         चिदानंद सरस्वती ने कहा कि आज की वैश्विक चुनौतियों, चाहे वे पर्यावरणीय हों, सामाजिक हों या मानसिक, का समाधान केवल बाहरी विकास में नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता और करुणा में निहित है। उन्होंने भारत की सनातन संस्कृति का उल्लेख करते हुए बताया कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव आज के विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ संपूर्ण मानवता एक परिवार के रूप में एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी है।                                     स्वामी  के प्रेरणादायक शब्दों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी चेतना हैं। उन्होंने गंगा की पवित्रता, स्वच्छता और संरक्षण पर बल देते हुए कहा कि माँ गंगा की रक्षा करना केवल भारत का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का दायित्व है। उन्होंने कहा कि “जब हम प्रकृति की रक्षा करते हैं, तब वास्तव में हम अपने भविष्य की रक्षा करते हैं।”

रशियन प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने यह भी साझा किया कि भारत की इस यात्रा में उन्हें भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और जीवन-दर्शन को गहराई से समझने का अवसर मिला, और परमार्थ निकेतन में बिताया गया समय उनकी इस यात्रा का सबसे भावनात्मक और आत्मिक पड़ाव रहा। उन्होंने कहा भविष्य में भारत और रूस के बीच सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और मानवीय संवाद और अधिक सुदृढ़ होगा।
रशियन दल के प्रमुख मिखाइल अस्लोव ने कहा कि पूज्य स्वामी जी के सान्निध्य में बैठकर उन्हें जीवन का उद्देश्य क्या है, जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है, हम क्यों हैं और जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना कैसे करेंकृइन सभी गहन जिज्ञासाओं के स्पष्ट व सार्थक उत्तर प्राप्त हुए।
इस अवसर पर परमार्थ निकेतन की ओर से प्रतिनिधिमंडल को स्मृति-चिह्न स्वरूप रूद्राक्ष का पौधा भेंट किए गए और उनके उज्ज्वल भविष्य व मंगल यात्रा की कामना की गई।
इस अवसर पर रशियन दल के प्रमुख मिखाइल अस्लोव, यूलिया, अन्ना और सदस्य उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन आकर उन्हें जीवन का वास्तविक उद्देश्य, जीवन का सच्चा लक्ष्य और आत्मिक संतुलन का बोध हुआ। यहाँ आकर जीवन से जुड़ी अनेक जिज्ञासाओं का समाधान मिला तथा आत्मचिंतन, शांति और सकारात्मक दिशा प्राप्त हुई, जिसने उनके दृष्टिकोण को गहराई से रूपांतरित कर दिया।


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